
णिधणगमणमेयभवे णासो ण पुणो पुरिल्लजम्मेसु ।
णासं वयभंगो पुण कुणइ भवसएसु वहुएसु॥1649॥
मृत्यु प्राप्त करने से होती मात्र एक पर्याय विनाश ।
किन्तु व्रतों का भंग बहुत से भव का करता पूर्ण विनाश॥1649॥
अन्वयार्थ : मरण को प्राप्त होना तो एक ही भव में नाश होना है, आगामी होने वाले भवों का नाश नहीं है, किन्तु व्रतभंग करने वाला तो सैकडों भव में दोषों के द्वारा अपना नाश करता है ।
सदासुखदासजी