आहारत्थं हिंसइ भणइ असच्चं करेइ तेणक्कं ।
रूसइ लुब्भइ मायां करेइ परिगिण्हदि य संगे॥1651॥
हिंसा करे झूठ बोले अरु चोरी भोजन हेतु करे ।
क्रोध लोभ अरु मायाचार करे परिग्रह स्वीकार करे॥1651॥
अन्वयार्थ : यह संसारी प्राणी आहार के लिये छहकाय के जीवों की हिंसा करता है, असत्य वचन बोलता है, चोरी करता है, रोष करता है, लोभ करता है, मायाचारी करता है और परिग्रह को ग्रहण करता है ।

  सदासुखदासजी