
होइ णरो णिल्लज्जो पयहइ तवणाणदंसण चरित्तं ।
आमिसकलिणा ठइओ छायं मइलेइ य कुलस्स॥1652॥
हो निर्लज्ज, ज्ञान, दर्शन अरु चारित का भी त्याग करे ।
भोजन कलि से ग्रस्त, मलिन-कुल करे और जूठा भोजन ले॥1652॥
अन्वयार्थ : आहार का लंपटी अपना पद नहीं देखता, कुल-जाति नहीं देखता, बहुत धन का धनी भी नीच, रंक, शूद्रादिक के घर भोजन के लिये बैठ जाता है । भोजन का लोलुपी तपश्चरण, ज्ञानाभ्यास, दर्शन, चारित्र सबको छोडकर भोजन में लग जाता है, अपने अपमानादि को भी नहीं देखता, अभक्ष्य में, उच्छिष्ट में, मांसादि में आसक्त होकर अपने उत्तम कुल की कांति को मलिन करता है ।
सदासुखदासजी