णासदि बुद्धी जिब्भावसस्स मंदा वि होदि तिक्खा वि ।
जोणिगसिलेसलग्गो व होइ पुरिसो अणप्पवसो॥1653॥
रसना के वश बुद्धिनाश हो तीव्र बुद्धि भी होती मन्द ।
विषय लुब्ध नर के समान वह हो जाता पर के आधीन॥1653॥
अन्वयार्थ : जो जिह्वा इन्द्रिय के वश होता है, उस पुरुष की बुद्धि नष्ट हो जाती है । बुद्धि विपरीत होकर भ्रष्ट हो जाती है, तीक्ष्णबुद्धि भी अत्यन्त मन्द हो जाती है और आहार का लंपटी अपने वश में नहीं रहता, पराधीन हो जाता है । जैसे जोणिकश्लेषलग्न पुरुष पराधीन हो गया । यहाँ "जोणिकसिलेसलग्गो1" इस पद का अर्थ हमारे समझ में नहीं आया, इसलिए नहीं लिखा है । (संस्कृत टीका - णासदि बुद्धि-बुद्धिर्नश्यति आहारलम्पटतया युक्तायुक्तविवे काकरणात् । कस्य? जिह्वावशस्य । तीक्ष्णाऽपि सति पूर्वं बुद्धि: कुण्ठा भवति । रसरागमलोपप्लुता अर्थयाथात्म्यं न पश्यतीति पारसीकक्लेशलग्न लिंग इव भवति । पुरुषोऽनात्मवश: । इस टीका से विद्वज्जन जान लेंगे ।)

  सदासुखदासजी