धीरत्तणमाहप्पं कदण्णदं विणयधम्मसब्भावो ।
पयहइ कुणइ अणत्थं गललग्गो मच्छओ चेव॥1654॥
महिमा धैर्य विनय कृतज्ञता तथा धर्म श्रद्धा छोड़े ।
मछली फँसी गले में जैसे वह नर बहुत अनर्थ करे॥1654॥
अन्वयार्थ : भोजन का लंपटी धर्म के श्रद्घान रहित ही होता है, अत: वह धर्म की श्रद्धा का भी त्यागी हुआ । जैसे कंठ को पकड कर मत्स्य अनर्थ करता है (महामत्स्य आहार-लोलुपी हो मुख को खोलकर पडे रहते हैं और जलचर जीवों को खाते हैं, वे आहार संज्ञा से मरकर सातवें नरक में जाते हैं) उससे भी अधिक अनर्थ भोजन की लम्पटता करती है ।

  सदासुखदासजी