
धीरत्तणमाहप्पं कदण्णदं विणयधम्मसब्भावो ।
पयहइ कुणइ अणत्थं गललग्गो मच्छओ चेव॥1654॥
महिमा धैर्य विनय कृतज्ञता तथा धर्म श्रद्धा छोड़े ।
मछली फँसी गले में जैसे वह नर बहुत अनर्थ करे॥1654॥
अन्वयार्थ : भोजन का लंपटी धर्म के श्रद्घान रहित ही होता है, अत: वह धर्म की श्रद्धा का भी त्यागी हुआ । जैसे कंठ को पकड कर मत्स्य अनर्थ करता है उससे भी अधिक अनर्थ भोजन की लम्पटता करती है ।
सदासुखदासजी