
आहारत्थं पुरिसो माणी कुलजादि पहिदकित्ती वि ।
भुंजंति अभोज्जाए कुणइ कम्मं अकिच्चं खु॥1655॥
उच्च कुलीन तथा मानी, प्रख्यात कीर्तिवाला नर भी ।
भोजन हेतु अभक्ष्य भखे अरु करे अयोग्य क्रिया सब ही॥1655॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष महा अभिमानी होता है और जिसके कुल की, जाति की कीर्ति भी जगत में प्रसिद्ध है, ऐसा पुरुष भी भोजन का लम्पटी होकर नहीं करने योग्य ऐसे अभक्ष्य तथा पर की उच्छिष्टादि का भी भक्षण करता है तथा भोजन का लम्पटी दीन होकर पर के मुख को ताकता फिरता है, याचना करता है, नहीं करने योग्य निंद्यकर्म भी करता है ।
सदासुखदासजी