आहारत्थं मज्जारिसुंसुमारी अही मणुस्सी वि ।
दुब्भिक्खादिसु खायंति पुत्तभंडाणि दइयाणि॥1656॥
क्षुत् पीड़ित होने पर बिल्ली, मच्छ, सर्पिणी, मानव भी ।
यदि दुर्भिक्ष पड़े तो भक्षण कर लेते पुत्रों का भी॥1656॥
अन्वयार्थ : दुर्भिक्ष आदि के समय बिल्ली, संसुमारी (जल में बसनेवाला मत्स्य विशेष), सर्पिणी और मनुष्यिणी भी आहार के लिये अपनी अतिवल्लभ सन्तान का भी भक्षण कर लेती है ।

  सदासुखदासजी