देविंदचक्कवट्टी य वासुदेवा य भोगभूमा य ।
आहारेण ण तित्ता तिप्पदि कह भोयणे अण्णो॥1664॥
सुरपति नरपति वासुदेव अरु भोगभूमि के जीवों की ।
तृप्ति न होती भोजन से, कैसे हो जन साधारण की॥1664॥
अन्वयार्थ : आहार से देवेंद्र, चक्रवर्ती, वासुदेव और भोगभूमि के मनुष्य भी तृप्त नहीं हुए तो भोजन से अन्य जन तृप्त होंगे क्या? कदापि तृप्त नहीं होते ।

  सदासुखदासजी