
उद्धदमणस्स ण रदी विणा रदीए कुदो हवदि पीदी ।
पीदीए विणा ण सुहं उद्धुदचितस्स घण्णस्स॥1665॥
चंचल चित में1 राग न होता राग बिना नहिं होती प्रीति ।
प्रीति बिना सुख नहीं अतः भोजन लम्पट नहिं कभी सुखी॥1665॥
अन्वयार्थ : भोजन के लंपटी का चित्त एक प्रकार के आहार में भी नहीं टिकता । मिष्ट भोजन करते-करते भी खट्टे भोजन की वांछा होती है तथा चिरपने में, खारे में एवं अन्यअन्य प्रकार के भोजन में चित्त उडता-फिरता है । इसलिए जिसका चित्त चलायमान है, उसे रति नहीं होती और रति बिना प्रीति नहीं होती, प्रीति बिना सुख नहीं होता । अत: आहार की गृद्धता - लंपटता से चलायमान जिसका चित्त है, उसे सुख कदापि नहीं होता ।
सदासुखदासजी