सव्वाहार विधाणेहिं तुमे ते सव्वपुग्गला बहुसो ।
आहारिदा अदीदे काले तित्तिं च सि ण पत्तो॥1666॥
भूतकाल में अन्न पान अरु स्वाद लेह ये चौ आहार ।
तृप्ति न हुई तुम्हें भक्षण कर सब पुद्गल को बारम्बार॥1666॥

  सदासुखदासजी