
किं पुण कंठप्पाणो आहारेदूण अज्जमाहारं ।
लभिहिसि तित्तिं पाऊणुदधिं हिमलेहणेणेव॥1667॥
आज तुम्हारे प्राण कंठ गत कैसे तृप्त करे आहार ।
सागर पीकर भी अतृप्त जो ओस बिन्दु कैसे सुखकार॥1667॥
अन्वयार्थ : हे क्षपक! अतीत काल में तुमने सभी आहारों के अनेक प्रकार के, सभी जाति के पुद्गल अनेक बार भक्षण किये तो भी तुम्हें तृप्ति नहीं हुई तो अब कंठगत प्राण हैं, तब अल्प आहार लेने से तृप्ति होगी क्या? तृप्ति नहीं होगी । जैसे कोई समुद्रों का जल पीकर भी तृप्त नहीं हुआ तो ओस की बूँद चाटने से तृप्ति होगी क्या? इसलिए आहार की अभिलाषा छोडकर संतोषरूप परम अमृत का आस्वादन करो ।
सदासुखदासजी