
को एत्थ विंभओ दे बहुसो आहारभुत्तपुव्वम्मि ।
जुं जेज्ज हुं अभिलासो अभुत्त पुव्वम्मि आहारे॥1668॥
उसकी कैसी उत्सुकता पहले जिसको खाया बहुबार ।
अभिलाषा को उचित कहें यदि भोजन मिलता पहली बार॥1668॥
अन्वयार्थ : इस संसार में पूर्वकाल में बहुत बार जिस आहार को भोगा है, उसे भोगने में तुम्हें क्या आश्चर्य? जो भूतकाल में नहीं खाया हो, ऐसे आहार की अभिलाषा करो, वह तो योग्य भी है, परंतु ऐसा कोई आहार नहीं, जिसे तुमने अनेक बार नहीं भोगा हो ।
सदासुखदासजी