आवादमेत्तसोक्खो आहारे ण हु सुखं बहुं अत्थि ।
दुख चेवत्थ बहुं आहट्टंतस्स गिंद्धीए॥1669॥
केवल जिह्वा अग्रभाग में रखने पर ही भोजन-सुख ।
किन्तु वांछित भोजन की लिप्सा से होते दुःख ही दुःख॥1669॥
अन्वयार्थ : जब जिह्वा के अग्रभाग पर आहार आता है, तभी सुख भासता है, वह सुख भी बहुत काल तक नहीं रहता, अतिगृद्धता से ग्रहण करने वाले को बहुत दु:ख होता है ।

  सदासुखदासजी