
जिब्भामूलं बोलेदि वेगदो वरहओव्व आहारो ।
तत्थेव रसं जाणइ ण य परदो ण वि य से पुरदो॥1670॥
रसना पर रखते ही भोजन तुरत उदर में जाता है ।
स्वाद आए जिह्वा पर ही पहले, पीछे नहिं आता है॥1670॥
अन्वयार्थ : आहार करने में सुख के काल की मन्दता/कमी दिखलाते हैं - श्रेष्ठ अच्छा आहार भी अश्व के समान अति शीघ्रता से करने पर जिह्वामूल का उल्लंघन करता है और स्वाद लेने की शक्ति केवल जिह्वाग्र में है । भोजन करते हुए पुरुष को जिह्वा पर पहुँचने के पहले और गले में जाने के बाद भोग्य पदार्थ का स्वाद नहीं आता । इसलिए रस का आस्वाद लेने का सुख भी अत्यन्त अल्पकाल ही रहता है ।
सदासुखदासजी