अच्छिणिमिसेणमेत्तो आहारसुहस्स सो हवइ कालो ।
गिद्धीए गिलइ वेगं गिद्धीए विणा ण होइ सुखं॥1671॥
पलक झपकने मात्र समय ही सुख होता है भोजन से ।
गृद्धि से ही शीघ्र निगलते सुख न मिले बिन गृद्धि के॥1671॥
अन्वयार्थ : आहार के रसास्वाद से उत्पन्न सुख का काल भी आँख की टिमकार मात्र है । ज्यों-ज्यों ग्रास में से रस निकलता है, त्यों-त्यों गृद्धतापूर्वक जल्दी से निगल जाता है और गृद्धता बिना सुख नहीं होता । चाह की दाह में किंचित् भोजनादि मिल जाये, उसे ही संसारी जीव सुख मानता है ।

  सदासुखदासजी