
दुक्खं गिद्धीघत्थस्साहट्टन्तस्स होइ बहुगं च ।
चिरमाहट्टियदुप्गयचेडस्स व अण्णगिद्धीए॥1672॥
अति लम्पटता से भोजन की वांछा से बहु दुःख होता ।
यथा अन्न की गृद्धि से चिर-व्याकुल दास दुःखी होता॥1672॥
अन्वयार्थ : अतिगृद्धता से पीडित होकर भोजन करने वाले पुरुष को बहुत दु:ख होता है । जैसे बहुत समय से अन्न की अभिलाषा - गृद्धता करने वाले दरिद्री के घर की दासी का पुत्र उसे भोजन करते ही दु:ख होता है ।
सदासुखदासजी