को णाम अप्पसुक्खस्स कारणं बहुसुखस्स चुक्केज्ज ।
चुक्कइ हु संकिलिसेण मुणी सग्गपवग्गाणं॥1673॥
थोड़े-से सुख हेतु बहुत सुख तजना चाहेगा नर कौन ।
संक्लेश भावों से मिलता नहीं स्वर्ग अरु शिव सुख भौन॥1673॥
अन्वयार्थ : ऐसा कौन बुद्धिमान है, जो किंचित् मात्र काल आहार के अल्पसुख के निमित्त बहुत सुख से चलायमान होगा? तैसे ही आहार स्वाद के अल्पकाल के सुख के लिये संक्लेश करके स्वर्ग-मुक्ति के सुखों से कौन मुनि चिगेगा?

  सदासुखदासजी