
महुलित्तं असिधारं लेहइ भुंजइ य सो सविसमण्णं ।
जो मरणदेसयाले पच्छेज्ज अकप्पियाहारं॥1674॥
शहद लपेटी असि को चाँटे विष मिश्रित भोजन करता ।
मरण समय जो क्षपक अयोग्य अशन की अभिलाषा करता॥1674॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष-क्षपक मरण के देशकाल/संन्यासकाल में अयोग्य आहार की वांछा करता है, आहार की प्रार्थना करता है तो वह शहद से लिपटी तलवार की पैनी धार को चाटता है तथा विषसहित अन्न का भोजन करता है ।
सदासुखदासजी