असिधारं व विसं वा दोसं पुरिसस्स कुणइ एयभवे ।
कुणइ दु मुणिणो दोसं अकप्पसेवा भवसएसु॥1675॥
मधुमय असि, विषमिश्रित भोजन करें अनर्थ इसी भव में ।
किन्तु अयोग्य अशन का सेवन करें अनर्थ सहस भव में॥1675॥
अन्वयार्थ : शहद लपेटी तलवार की धार चाटने से तथा विषसहित भोजन करने से तो एक भव में ही दोष होता है, मृत्यु होती है, परंतु अयोग्य आहारादि का सेवन मुनीश्वरों के तथा श्रावकों के अनेक सैकडों-हजारों भवों में दोष करता है । इसलिए अयोग्य वस्तु का सेवन करना योग्य नहीं, आगामी काल में बहुत दु:खदायी होता है ।

  सदासुखदासजी