
जावंति किंचि दुक्खं सारीरं माणसं च ।
पत्तो अणंतखुत्तं कायस्स ममत्तिदोसेण॥1676॥
अहो क्षपक ! जो शारीरिक अरु मानस दुःख भोगे बहुबार ।
वे सब तन में ममता के कारण ही भोगे यह श्रुत-सार॥1676॥
अन्वयार्थ : हे मुने! संसार में जितने भी शरीर संबंधी तथा मन संबंधी दु:ख अनन्त बार प्राप्त हुए हैं, वे सभी दु:ख एक देह में ममत्व के दोष से प्राप्त हुए हैं । संसार में जितने दु:ख हैं, वे शरीर के ममत्व के कारण भोगे हैं ।
सदासुखदासजी