एण्हं पि जदि ममत्तिं कुणसि सरीरे तहेव ताणि तुमं ।
दुक्खाणि संसरंतो पाविहसि अणंतयं कालं॥1677॥
अतः अभी भी इस तन के प्रति यदि तुम ममता करते हो ।
तो चारों गतियों में काल अनन्त महा दुःख भोगोगे॥1677॥
अन्वयार्थ : हे मुने! अब भी यदि शरीर में तुम ममत्व करोगे तो अनन्त काल पर्यंत संसार में परिभ्रमण करते हुए दु:खों को ही भोगोगे ।

  सदासुखदासजी