अण्णं इमं सरीरं अण्णो जीवोत्ति णिच्छिदमदीओ ।
दुक्खभयकिलेसयरीं मा हु ममत्तिं कुण सरीरे॥1679॥
देह भिन्न है जीव भिन्न है एेसी निश्चित मति करके ।
भय दुःख और क्लेश कारक इस तन ममत्व को दूर करो॥1679॥
अन्वयार्थ : यह शरीर अन्य है और जीव अन्य है । इस प्रकार निश्चयरूप है बुद्धि जिनकी ऐसे तुम, अब दु:ख, भय और क्लेश को करने वाले शरीर में ममता मत करो । भावार्थ - शरीर तो अनेक पुद्गल परमाणुओं के समूहरूप पुद्गलमय है, जड है, अचेतन है, विनाशीक है और आत्मा अमूर्तिक है, ज्ञाता है, चेतन है और अविनाशी है, इसलिए पुद्गल अन्य है और आत्मा अन्य है । इन दोनों की प्रगट भिन्नता का अनुभव करते हुए तुम शरीर से ममत्व मत करो । कैसा है शरीर? क्षुधा, तृषा, रोग, शोक, वियोगादि से आत्मा को महान दु:ख उत्पन्न करने वाला है एवं भय, संक्लेश का करने वाला है, इसलिए ज्ञानभावना को पाकर भी अब शरीर में ममता करना योग्य नहीं है ।

  सदासुखदासजी