
सव्वं अधियासंतो उवसग्गविधिं परीसहविधिं च ।
णिस्संगदाए सल्लिह असंकिलेसेण तं मोहं॥1680॥
सभी तरह के उपसगाब अरु सब परिषह को सहन करो ।
तुम निःसंग भावना से संक्लेश रहित कृश-मोह करो॥1680॥
अन्वयार्थ : हे मुने! सर्व प्रकार के उपसर्ग और क्षुधा, तृषा, रोगादि से उत्पन्न सभी परीषहों को सहते हुए नि:संग होओ । संक्लेश परिणाम रहित होकर मोह को कृश करो ।
सदासुखदासजी