ण वि कारणं तणादीसंथारो ण वि य संघसमवाओ ।
साधुस्स संकिलेसो तस्स य मरणावसाणम्मि॥1681॥
तृण संस्तर अरु मुनिगण का संग नहिं सल्लेखन का कारण ।
संक्लेश परिणाम रहें यदि क्षपक मुनि के मरण समय॥1681॥
अन्वयार्थ : समाधिमरण के अवसर में संक्लेश करने वाले साधु के सल्लेखना का कारण तृणादि के संस्तर नहीं हैं और सर्व संघ भी नहीं है । संक्लेश परिणाम के धारक जीव को तृणादि का संस्तर वृथा है, संघ का संबंध भी कार्यकारी नहीं । संक्लेशरहित मन्दकषायी वीतरागी हुए बिना सल्लेखना मरण नहीं होता ।

  सदासुखदासजी