पं-सदासुखदासजी
जह वाणियगा सागर जलम्मि णावाहिं रयणपुण्णाहिं ।
पत्तणमासण्णा वि हु पमादमूढा विवज्जति॥1682॥
ज्यों रत्नों से भरी नाव लेकर के आये नगर समीप ।
किन्तु प्रमादवशात् मूढ़ हो डूबे सागर-नीर वणिक्॥1682॥
सदासुखदासजी