
सल्लेहणा विसुद्धा केई तह चेव विविहसंगेहि ।
संथारे विहरंता वि संकिलिठ्ठा विवज्जंति॥1683॥
सल्लेखना विशुद्ध करें पर कोई मुनि परिग्रह के साथ ।
संस्तर पर आरूढ़ किन्तु संक्लेश भाव से करें विनाश॥1683॥
अन्वयार्थ : हे क्षपक! जिसप्रकार व्यापारी का रत्नों से भरा हुआ जहाज प्रमाद के कारण नगर के निकट आया हुआ भी सागर में डूब जाता है । उसी प्रकार कोई जीव उज्ज्वल सल्लेखना धारण करते हुए भी अनेक प्रकार के राग-द्वेष-मोहादि भाव रूप परिग्रह के कारण संक्लेश परिणामी हुए संस्तर में प्रवर्तने पर भी संसार-समुद्र में डूब जाते हैं ।
सदासुखदासजी