सल्लेहणापरिस्सममिमं कयं दुक्करं च सामण्णं ।
मा अप्पसोक्खहेउं तिलोगसारं वि णासेइ॥1684॥
परिश्रम से पाई है सल्लेखना और दुष्कर श्रामण्य ।
थोड़े सुख के लिए न छोड़ो तीन लोक का सुख अनुपम॥1684॥
अन्वयार्थ : हे साधो! अनशनादि तप के द्वारा किया गया जो सल्लेखना का परिश्रम तथा तीन लोक में सार, स्वर्ग-मोक्ष को देने वाला और बहुत कष्टों से भी अप्राप्त, ऐसे साधुपने को आहारकृत अल्प सुख के कारण विनाश मत करो ।

  सदासुखदासजी