धीरपुरिसपण्णत्तं सप्पुरिसणिसेवियं उवणमित्ता ।
धण्णा णिरावयक्खा संथारगया णिसज्जंति॥1685॥
धैर्यवान अरु श्रेष्ठ नरों के द्वारा सेवित पाकर मार्ग ।
धन्य और निरपेक्ष क्षपक संस्तर पर साधें मुक्ति-मार्ग॥1685॥
अन्वयार्थ : उपसर्ग और परीषहों के प्राप्त होने पर भी जिनका धैर्य नहीं छूटता - ऐसे धीर पुरुषों द्वारा उपदिष्ट और सत्पुरुषों द्वारा सेवन किये गये रत्नत्रय मार्ग को प्राप्त होकर जो आहारादि तथा शरीरादि की वांछा रहित होकर संस्तर को प्राप्त हुए हैं, वे धन्य हैं, वे ही शुद्ध होते हैं ।

  सदासुखदासजी