इय पण्णविज्जमाणो सो पुव्वं जायसंकिलेसादो ।
विणियत्तंतो दुक्खं पस्सइ परदेहदुक्खं वा॥1687॥
एेसा समझाने पर निज को क्लेश भाव से दूर हटा ।
अपने दुःख को एेसे देखे जैसे यह दुःख पर-तन का॥1687॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार निर्यापकाचार्य द्वारा क्षपक को भेदविज्ञान का उपदेश दिया जाने पर वह क्षपक पूर्व में अज्ञानभाव से उत्पन्न हुए संक्लेश भाव को छोड देता है । जैसे पर के देह में उत्पन्न दु:ख अपने को प्राप्त नहीं होता, वैसे ही अपनी देह में उत्पन्न दु:ख को भी पर की देह के दु:ख समान देखता है ।

  सदासुखदासजी