रायादिमहढ्ढिययागमणपओगेण चा वि माणिस्स ।
माणज्णणेण कवयं कायव्वं तस्स खवयस्स॥1688॥
भूपति आदि महा-पुरुषों को लेकर आए क्षपक के पास ।
मान-दान देकर मानी की रक्षा करना है कर्त्तव्य॥1688॥
अन्वयार्थ : जैसे राजादि महान ऋद्धि के धारकों का आगमन देखकर, अभिमानी शूरवीर बख्तर (कवच) पहनकर युद्ध के लिये तैयार हो जाता है । वैसे ही क्षपक भी ऐसा चिंतवन करते हैं कि हमारी धीरता देखने को ये महान ऋद्धि के धारक वीतरागी मुनि हमारे निकट आये हैं । अब यदि इनके सामने मेरे प्राण जायें तो जाओ, योग्य ही है; परन्तु धैर्य को त्याग कर व्रत भंग करके धर्म को लज्जित नहीं करूँगा । ऐसे उत्तम पुरुषों के संसर्ग से कायर भी धैर्यरूप बख्तर धारण करके कर्म से युद्ध करने को उद्यमी हो जाता है ।

  सदासुखदासजी