
जह कवचेण अभिंज्जेण कवचिओ रणमुहम्मि सत्तूणं ।
जायइ अलंघणिज्जो कम्मसमत्थो य जिणदि य ते॥1690॥
यथा अभेद्य कवच से रक्षित शूरवीर रण-भूमि में ।
रहे अलंहय शत्रु से किन्तु हो समर्थ जय करने में॥1690॥
अन्वयार्थ : जैसे अभेद्य बख्तर को पहनकर सजा हुआ योद्धा संग्राम के सामने - युद्धक्षेत्र में बैरियों के द्वारा अलंघ्य होता है, शत्रुओं के शस्त्रों से घाता नहीं जाता, प्रहारणादि/प्रहार आदि क्रियाओं में समर्थ होता है, वैसे कवच का वर्णन किया । इसे हृदय में धारण करने वाला पुरुष ही कर्मरूपी शत्रुओं द्वारा घाता नहीं जाता और कर्म के मारने में/प्रहार आदि क्रियायें करने में समर्थ होता है तथा कर्मशत्रुओं को जीतता है ।
सदासुखदासजी