
एवं खवओ कवचेण कवचिओ तह परीसहरिऊणं ।
जायइ अलंघणिज्जो ज्झाणसमत्थो य जिणदि य ते॥1691॥
इसीप्रकार कवच से रक्षित क्षपक न हो परिषह वश में ।
उन्हें जीतकर वह समर्थ हो जाता निज को ध्याने में॥1691॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार कवच से युक्त क्षपक, परीषहरूपी शत्रुओं के द्वारा अलंघ्य होता है और ध्यान करने में समर्थ होता है एवं कर्मशत्रुओं को जीतता है ।
सदासुखदासजी