
एवं अधियासंतो सम्मं खवओ परीसहे एदे ।
सव्वत्थ अपडिवद्धो उवेदि सव्वत्थ सम्भावं॥1692॥
इसप्रकार इन परीषहों को सम्यक्तया सहन करता ।
सबके प्रति निर्मम होता है क्षपक साम्य धारण करता॥1692॥
अन्वयार्थ : ऐसे वीतरागी गुरुओं द्वारा धारण कराये गये कवच के प्रभाव से क्षुधा, तृषा, रोग वेदनादि परीषहों को संक्लेशरहित परम समता भावों से सहने वाले क्षपक शरीर में, वसतिका में, सकल संघ में, वैयावृत्त्य करने वालों में और समस्त क्षेत्र-कालादि में रागद्वे ष रहित होकर, किसी में भी परिणामों के द्वारा बँधते नहीं हैं/निह्नस्पृह रहते हैं, परम समता भाव को प्राप्त होते हैं ।
सदासुखदासजी