
सव्वेसु दव्वपज्जयविधीसु णिच्चं ममत्तिदो विजडो ।
णिप्पणयदोसमोहो उवेदि सव्वत्थ समभावं॥1693॥
द्रव्य और सब पर्यायों में करता ममता का परिहार ।
स्नेह, दोष अरु मोह रहित हो धारण करता है समभाव॥1693॥
अन्वयार्थ : वह साधु समस्त द्रव्य-पर्यायों के विकल्पों में शाश्वत/सर्वत्र ममत्व रहित है, स्नेह, द्वेष, मोह रहित है; वह सर्वत्र समभाव को प्राप्त होता है ।
सदासुखदासजी