
संजोगविप्पओगेसु जहदि इठ्ठेसु वा अणिठ्ठेसु ।
रदि अरदि उस्सुगत्तं हरिसं दीणत्तणं च तहा॥1694॥
इष्ट-अनिष्ट संयोगों और वियोगों में रति-अरति नहीं ।
उत्सुकता या हर्ष दीनता राग-द्वेष परभाव नहीं॥1694॥
अन्वयार्थ : कवच के द्वारा धैर्य धारण करने वाले साधु, संयोग में रति नहीं करते और वियोग में अरति नहीं करते । इष्ट वस्तु के संयोग में उत्सुकता तथा हर्ष नहीं करते तथा अनिष्ट वस्तु के संयोग में दीनता तथा विषाद नहीं करते ।
सदासुखदासजी