मित्तेसुयणादीसु य सिस्से साधम्मिए कुले चावि ।
रागं वा दोसं वा पुव्वं जायंपि सो जहइ॥1695॥
मित्रों में स्व-जनों में अथवा साधर्मी या शिष्यों में ।
हुए पूर्व में राग-द्वेष जो उन सबका परिहार करे॥1695॥
अन्वयार्थ : मित्रों में, स्वजनादिकों में, शिष्यों में, साधर्मियों में, कुल में, पूर्व में उत्पन्न हुए राग-द्वेष को कवच धारण करने वाले साधु त्याग देते हैं ।

  सदासुखदासजी