भोगेसु देवमाणुस्सगेसु ण करेइ पच्छणं खवओ ।
मग्गो विराधणाए भणिओ विसयाभिलासोत्ति॥1696॥
शिवपथ की विराधना में है विषयों की अभिलाषा मूल ।
अतः क्षपक नर-सुर सम्बन्धी भोगों की वांछा से दूर॥1696॥
अन्वयार्थ : कवच की दृढता को प्राप्त हुए साधु देव-मनुष्यों के भोगों की वांछा नहीं करते, क्योंकि विषयों में अभिलाषा रत्नत्रय धर्म तथा दशलक्षणधर्म रूप मार्ग की विराधना का कारण है । ऐसा जिनेन्द्र भगवान ने कहा है ।

  सदासुखदासजी