पं-सदासुखदासजी
इठ्ठेसु अणिठ्ठेसु य सद्दफरिसरसरूवगंधेसु ।
इह परलोए जीविदमरणे माणावमाणे च॥1697॥
शब्द रूप रस गन्ध स्पर्श लगें जो इष्ट तथा अन् इष्ट ।
इस भव पर-भव में जीवन या मरण मान-अपमानों में॥1697॥
सदासुखदासजी