सव्वत्थ णिव्विसेसो होदि तदो रागदोसरहिदप्पा ।
खवयस्स रागदोसा हु उत्तमठ्ठं विर धेंति॥1698॥
इष्ट अनिष्ट विकल्प रहित हो राग-द्वेष परित्याग करे ।
क्योंकि क्षपक के राग-द्वेष रत्नत्रय निधि का नाश करे॥1698॥
अन्वयार्थ : जो वीतरागी कवच धारण करता है, वह मुनि इष्ट-अनिष्ट शब्द, स्पर्श, रस, रूप, गंध, पंचेन्द्रियों के विषयों में, इस लोक, परलोक में, जीवन-मरण में, मानापमान में राग-द्वेष रहित होकर सबमें समताभाव धारण करता है; क्योंकि इस जगत में जितने इन्द्रियों के विषय हैं, वे सभी पुद्गल द्रव्यों की पर्यायें हैं और ज्ञानानन्द स्वरूप जो मैं उनसे भिन्न हूँ । अब मैं किसमें राग-द्वेष करूँ? इसलिए जैन यति समस्त परद्रव्यों में और इन्द्रियों के विषयों में राग-द्वेष रहित होते हैं । ये राग-द्वेष हैं, वे साधु का उत्तमार्थ जो आराधनामरण का विनाश करते हैं ।

  सदासुखदासजी