
जदि वि य से चरिमंते तसमुदीरदि मारणंतियमसायं ।
सो तह वि असंमूढो उवेदि सव्वत्थ समभावं॥1699॥
यद्यपि मरण समय में मुनि को मरणान्तिक दुःख हो जाए ।
किन्तु क्षपक निर्माेह रहे अरु सब में समता भाव धरे॥1699॥
अन्वयार्थ : यद्यपि क्षपक को अंत समय में मरण प्राप्त होने तक दु:ख उदीरणा को प्राप्त होगा अर्थात् तीव्र दुह्नख होगा, तथापि मोहरहित होने सेसमस्त दु:ख में तथा सुख-दु:ख सामग्री में समभावी रहते हैं ।
सदासुखदासजी