एवं सुभाविदप्पा विहरइ सो जाववीरियं काये ।
उठ्ठाणे सयणे वा णिसोयणे वा अपरिदंतो॥1700॥
इसप्रकार सम्यक् भावित वह क्षपक न हो जबतक तन क्षीण ।
तब तक उठने और बैठने में प्रवृत्ति वह करे प्रवीण॥1700॥
अन्वयार्थ : ऐसे आचार्य के निकट भले प्रकार भाया है आत्मा जिसने, ऐसा क्षपक जब तक शरीर में शक्ति रहती है, तब तक उठने में, शयन में, आसन में खेद रहित होकर प्रवर्तन करता है ।

  सदासुखदासजी