पं-सदासुखदासजी
जाहे सरीरचेट्ठा विगदत्थामस्स से यदणुभूदा ।
देहादि वि ओसग्गं सव्वत्तो कुणइ णिखेक्खो॥1701॥
शक्तिहीन होने पर उसकी शारीरिक चेष्टा जब मन्द ।
हो निरपेक्ष वचन-मन-तन से देह त्याग कर हो निर्द्वन्द्व॥1701॥
सदासुखदासजी