
सेज्जा संथारं पाणयं चउधिं तहा सरीरं च ।
विज्जावच्चकरा वि य वोसरइ समत्तमरूढो॥1702॥
संस्तर पर आरूढ़ क्षपक वह संस्तर, पिच्छी, पानक का ।
तन का अरु वैयावृत करनेवालों का भी त्याग करे॥1702॥
अन्वयार्थ : क्षपक के शरीर की शक्ति जब क्षीण हो जाती है तो शरीर की चेष्टा, गमन, आगमन तथा उठना-बैठना अति अल्प रह जाता है । उस समय सर्व वांछा रहित/निह्नस्पृह भावयुक्त हुआ शरीरादि का त्याग करने में प्रयत्नशील रहता हैऔर सम्पूर्ण रत्नत्रय में आरूढ होता हुआ शय्या, संस्तर, पान, उपकरण तथा शरीर और वैयावृत्त्य करने वालों का भी त्याग कर देते हैं ।
सदासुखदासजी