अवहट्ट कायजोगे व विप्पओगे य तत्थ सो सव्वे ।
सुद्धे मणप्पओगे होद णिरुद्धज्झवसियप्पा॥1703॥
वचन काय योगों को तज थिर शुद्ध मनोयोग में हो ।
पर-चिन्तन से रोक चित्त को निज चिन्तन में लीन करो॥1703॥
अन्वयार्थ : उस समय समस्त काय योगों और वचन प्रयोगों का निराकरण करके, रोका है अन्य विषयों में प्रचार (प्रवृत्ति) जिसने, ऐसे विशुद्ध मनोयोग रूप होकर समस्त परद्रव्यों में प्रवृत्ति को त्यागकर चित्त को अपने वश/आत्मवश करके, चित्त का निरोधएकाग्र रूप होता है ।

  सदासुखदासजी