पं-सदासुखदासजी
एवं सव्वत्थेसु वि समभावं उवगओ विसुद्धप्पा ।
मित्ती करुणं मुदिदमुवेक्खं खवओ पुण उवेदि॥1704॥
सब में समता भाव धारकर निर्मल चित्त क्षपक होता ।
मैत्री करुणा अरु प्रमोद माध्यस्थ भावनायें भाता॥1704॥
सदासुखदासजी