जीवेसु मित्तचिंता मेत्ती करुणा य होइ अणुकंपा ।
मुदिदा जदिगुणचिंता सुहदुक्खधियासणमुवेक्खा॥1705॥
जीवों के प्रति मैत्री दुखियों में अनुकम्पा है करुणा ।
यति-गुण चिन्तन में प्रमोद हो सुख-दुःख में होवे समता॥1705॥
अन्वयार्थ : इसप्रकार समस्त पदार्थ में समभाव को प्राप्त और उज्ज्वल है चित्त जिसका, ऐसा वह क्षपक अब मैत्री, कारुण्य, मुदित/प्रमोद और उपेक्षा अर्थात् माध्यस्थ भावनाओं को भाता है ।

  सदासुखदासजी