
दंसणणाणचरित्तं तवं च विरियं समाधिजोगं च ।
तिविहेणुवसंपज्जिय सव्वुवरिल्लं कमं कुणइ॥1706॥
दर्शन ज्ञान चरित्र वीर्य तप अरु समभाव समाधि स्वरूप ।
मन-वच-तन से प्राप्त करे फिर क्षपक ध्यान उत्कृष्ट धरें॥1706॥
अन्वयार्थ : दर्शन, ज्ञान, चारित्र, तप, अपनी शक्ति को नहीं छिपाने रूप वीर्य, चित्त को एकाग्र - विकल्परहित करना यह समाधियोग, इन्हें जो मुनि मन-वचन-काय से अंगीकार करता है, वह सर्वोत्कृष्ट क्रिया को करता है ।
सदासुखदासजी