
जिदरागो जिददोसो जिदिंदिओ जिदभओ जिदकसाओ ।
अरदिरदिमोहणो ज्झाणोवगओ सदा होहि॥1707॥
जो जितराग जितेन्द्रिय जितमय जितकषाय जितद्वेष रहे ।
अरति रति अरु मोह मथन करता वह ध्यान सुलीन रहे॥1707॥
अन्वयार्थ : जीता है और जीती हैं क्रोध, मान, माया, लोभ रूप कषायें जिसने तथा रतिभाव एवं मोहभाव का जिसने नाश किया है - ऐसे पुरुष - साधु सदा काल ध्यान को प्राप्त होते हैं ।
सदासुखदासजी