एयग्गेण मणं रुंभिऊण धम्मं चउव्विहं झादि ।
आणापायविवागं विचयं संठाणविचयं च॥1717॥
आज्ञाविचय अपायविचय संस्थानविचय अरु विचयविपाक ।
चार तरह के धर्म ध्यान को ध्याता क्षपक हुआ एकाग्र॥1717॥
अन्वयार्थ : जो इन्द्रियों को वश करने की, कषायों का निग्रह करने की, योगों का निरोध करने की इच्छा करता है तथा प्रचुर निर्जरा की इच्छा करता है, चित्त को अपने वश करना चाहता है और रत्नत्रयमार्ग से नहीं छूटना चाहता है तो किंचित् बाह्य पदार्थ से दृष्टि संकोच कर, शुभध्यान में अन्तर्दृष्टि को रोककर, संसार के अभाव हेतु आत्मा में स्मरण/उपयोग को जोडकर, विषयों से इन्द्रियों को रोककर, इन्द्रियों से मन को रोककर और योग्य वीर्यान्तराय का क्षयोपशम विचार कर, मन को आत्मा में धारण करता है/लगता है । वह इस मन को एकाग्र्र-रोककर आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय, संस्थानविचय - इन चार प्रकार के धर्मध्यान को ध्याता है ।

  सदासुखदासजी