आलंवणं च वायण पुच्छण परिवट्टणाणुपेहाओ ।
धम्मस्स तेण अविसुद्धाओ सव्वाणुपेहाओ॥1719॥
स्वयं वाचना तथा पूछना परिवर्तन अरु अनुप्रेक्षा ।
धर्म-ध्यान के आलम्बन हैं सब उससे अविरुद्ध कहा॥1719॥
अन्वयार्थ : धर्मध्यान का आलम्बन पंचप्रकार का स्वाध्याय है - वाचना, पृच्छना, परिवर्तन, अनुप्रेक्षा और इनसे अविरुद्ध समस्त अनुप्रेक्षाओं की भावना । यह धर्मध्यान करने का बाह्य-अभ्यन्तर अवलम्बन है ।

  सदासुखदासजी